Jaan Nikalkar Chali Gayi
By Mohammad Imran Khan
साँसें चल रही थी l
दिल धड़क रहा था l
यूँ तो मैं ज़िंदा ना था l
अचानक से वो मेरी ज़िन्दगी में आई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
हमेशा उदास रहने वाला मैं l
इंसानों से दूर रहने वाला मैं l
आरज़ी दुनिया से मतलब ना रखने वाला मैं l
वो मुझे खुश रहना सिखाकर चली गई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
यूँ तो किसी से बोलता ना था मैं l
इस दुनिया से कटा-कटा रहता था मैं l
अब उसमें दिलचस्पी लेने लगा था मैं l
वो मुझे दुनियादार बनाकर चली गई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
उसकी बातें ख़त्म होने का नाम ना लेती थी l
किसी की ना सुनने वाला उसको सुनने लगा था l
कान अब उसकी आवाज़ को तरसने लगे थे l
वो अपनी आवाज़ का दीवाना बनाकर चली गई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
यूँ तो मुझमें कोई खूबी ना थी l
उसने तार्रुफ़ कराया मेरी खूबियों से l
अच्छा इंसान खुद को समझने लगा था मैं l
वो मुझे इंसान बनाकर चली गई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
फिर यूँ हुआ मुझको उसकी आदत हो गई l
अब उसके बिना जीना मरने से बद्तर था l
नशे से ज़्यादा उसका तलबगार हो गया था मैं l
वो मुझे अपना तलबगार बनाकर चली गई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
फिर यूँ हुआ मेरी ज़रूरत ख़त्म हो गई l
अब उसके किसी काबिल ना रहा मैं l
हज़ार ख़ामियाँ मुझमें निकालने लगी थी वो l
वो मुझसे मेरी जान निकालकर चली गई l
वो मुझमें जान डालकर चली गई ll
मुझसे दोस्ती का बहाना बनाती थी वो l
मेरी दरियादिली का फ़ायदा उठाती थी वो l
बंदर की तरह नचाती थी वो l
वो मेरी दोस्ती का मज़ाक बनाकर चली गई l
वो मेरी जान निकालकर चली गई ll
By Mohammad Imran Khan

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