top of page

Ishq(इश्क़)

By Saksha Damare



उसे कहा ढूंढे हम ,

यहां दास्तान-ए-ग़म के आलम में सारा जमाना रो रहा है।

इश्क़ की परछाई भी बड़ी कातिलाना है जनाब ।

यहां क़तील के जनाजे में खुद कातिल भी रो रहा है।


By Saksha Damare



Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page