Ishfaq Rahe, Ishfaq Rahe
By Anita Rao Potnis
कभी साजिशो ने बांटा, कभी ख्वाइशों ने लूटा
कभी सरहदें बानी , कभी लकीरें तनी
देश बड़े होते गए , दिल छोटे होते गए
पास वालों का ग़म , भूलते गए हम
दूरियों को अपनाया , इंसानियत को किया पराया
जो साथ निभाने की कोशिश थी , सच थी की गलती थी
दिन के उजाले में रात के पैमाने में
क्यों खो गए हम , अपने बनाई दीवारों में
कहाँ ढूंढे अमन को , अमन डर के छिप गया है
आवाज़ दबी हर अच्छाई की , ख़ुशी पे गहरा पहरा है
कहो तो जगा दे , फिर इश्क़ की शहनाई को
आंसू देने के बदले , बाँट ले सारे दर्द को
क्या हसीं गुज़रा ज़माना था , याद करके क्या कहे
यही दुआ है के सबके दिल में , बस इश्फाक रहे , इश्फाक रहे
बनारस की चौखट हो , या हज़रतबल की मोहलत हो
मांगते सब एक ही चीज़ है , धूप हो बरसात हो
अब थक गए नफरत करके , क्यों और ये दुःख सहे
यहीदुआहैकेसबकेदिलमें , बसइश्फाकरहे , इश्फाकरहे
By Anita Rao Potnis

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