Guru Vandana
By Srishti Kyal
ना कोई मंज़िल, न रास्ता था,
खुद ही को खोकर मैं जी रहा था,
अपना कर मुझे इस लायक बना दिया,
पतित को प्रभु का सेवक बना दिया।।
गुरु की दृष्टि पड़ी जब मुझ पर,
लोहे को चमकता सोना बना दिया ,
कलमश्ताओ से भरे इस मन को,
कृष्ण चरणों में अर्पित करवा दिया।।
आपकी हर वाणी देती है सीख नई,
आंखों से हर दम आपकी बरसे शीश ही,
कृपा दृष्टि ने आपकी मुझे संवार दिया,
कृष्ण को मेरा अपना बना दिया।।
राधा रानी से करती हूं विनती यही
आप का सानिध्य मिलता रहे हर घड़ी,
कोई भूल ना हो मुझसे भूल कर भी,
आपकी प्रसन्नता ही रहे सर्वोपरि।।
By Srishti Kyal

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