Guru Guarang
By Srishti Kyal
गुरुदेव की हर बात है निराली,
निताई गौर कृपा है पहली प्रणाली।
समझाई थी गुरु ने कभी ये बात,
इस पतित के मन को भाई आज।।
गौर प्रेम से भीगने लगा मन,
निताई ने जब लुटाया अपना धन।
नृत्य कर रहे देखो, नदिया बिहारी,
इस छवि पर मैं जाऊं बलिहारी।।
उनके चेहरे को चूमते घुंघराले बाल,
जैसे भवरों का हो कोई झुंड विशाल।
निताई गौर नाच रहे बैयां डाल,
हरि नाम की छिड़ी जब मधुर ताल,
गुंजायमान हुआ अंबर, रुक गया काल।।
कटिली चितवन, चमचमाता गौर वर्ण,
रोमांचित तन, पुलकित होता कण-कण।
अश्रु से भरे नयन दयाल,
नृत्य में कुशल नंदलाल,
बनकर गौर कर रहे कमाल।।
दृश्य नजरों से ओझल ना हो कभी,
मूंद मूंद कर आंखों को जाना चाहूं वही,
रो-रो कर गुरुदेव से करू यही पुकार,
चलो लेकर संग अपने फिर एक बार।।
By Srishti Kyal

Comments