Gupshup
By Srishti Kyal
मनुष्य बनाता है सामाजिक चाल ढाल,
बुनता रहता है बातों का जाल।
अपने जीवन पर चाहे मंडरा रहा हो काल,
पड़ोसियों के हर क्षण का रखता है ख्याल।।
हर जवाब में ढूंढता सवाल,
कब, क्यों, कैसे, हुआ ये हाल।
समाज है एक भव्य रंगमंच,
हर घर में होता रंगीन प्रपंच ।।
घर घर की अपनी ही कहानी है,
पर कहानियां दूसरों की भाती है,
किसने किसके साथ भिड़ाया टांका,
किसके यहां पड़ा कौन सा डाका।।
बातों का सिलसिला यूं ही चलता रहता,
अफवाह या सच बेपरवाह बहता रहता।
मनुष्य की यही तो है भूल,
खुद को नहीं देता वो तूल।।
बातें बनाते हुए खुद पर होता नाज़,
इन बातों में छिपे है कई दिलचस्प राज़।
ठहाके लगाकर हंसते हैं सभी,
चुटकुले हो पड़ोसी पर जब कभी।।
बातों बातों में बन जाते है किस्से,
सुख-दुख आएंगे आपके हमारे ही हिस्से,
चाहे करे हम कितनी भी ताका झांकी,
मुश्किल घड़ियां हमने मिलकर है बांटी।।
गपशप करना तू हमारा अधिकार है,
फिर भी हम एक दूसरे का परिवार हैं,
एक दूजे के बिना ना हमारा आधार है,
यह खट्टा मीठा जीवन हमें स्वीकार है।।
By Srishti Kyal

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