Gehari Raat
By Himanshu Sahwal
शिकायत मुझे इस रात से ऐसी,
कैसी दीर्घ खामोशी ये लाई है;
घने किसी वृक्ष से छीनी,
जैसे सूरज ने उसकी परछाई है।
इस रात की ये किताब ऐसी,
इसमें सिले पन्ने हजारों हैं,
उन्ही कुछ पन्नों पे मैंने,
लिखे कुछ शब्द हज़ारों हैं।
शायद अब इस खामोशी से,
जन्मा भीतर इक जुनून है,
अब शायद कोई बैर भी नहीं,
मिला इसी में मुझे सुकून है।
By Himanshu Sahwal

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