Firaq (फ़िराक़)
By Suyash Muluk
जो बित गयी है फ़िराक़ मैं
वो रातों का हिसाब बाकी है,
तुम्हे यहा से गुजरे अरसा बित गया
लेकीन इस कमरे मैं
अभी तुम्हारी महक बाकी है;
गुजर रही हैं जिंदगी तब से
इसी कमरे के इक तीरगी कोने मैं,
जहा मैं और मेरी कविताओं मे
मेरी तन्हाई का सौदा जारी है,
जो बित गयी है फ़िराक़ मैं
वो रातों का हिसाब बाकी है;
सितमगर ये जमाना गाता फिरता है
नग़्मा मेरे वीरानी का,
यह अंधा जमाना वाक़िफ़ नही
तेरी यादों का कारवाँ मेरे ज़ीस्त का साथी हैं,
जो बित गयी है फ़िराक़ मैं
वो रातों का हिसाब बाकी है;
हलकीसी भी होती है दरवाजे पर खटखटाहट
तो दिल मचल उठता है जैसे,
तुम्हारे लौटने की तमन्ना ए हम-नफ़स
अभी इस दिल मै बाकी है,
जो बित गयी है फ़िराक़ मैं
वो रातों का हिसाब बाकी है;
By Suyash Muluk

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