Fakeer
By Amritanshu Singh
फकीर हूं में दूर शहर का, तेरे द्वार कुछ मांगने आया हूं।
खुदा के नाम से कुछ खाने को दे, कई दिनों से कुछ ना खाया हूं,
दर दर ठोकरें खाते हुवे पोहचा हूं तेरे दरवाज़े,
दे दे कुछ निवाले, कई दिनों से कुछ ना खाया हूं।
समेटे अपना बस्ता आया हूं तेरे शहर
उम्मीद कम, भूख की पुकार लाई है इतनी दुर।
पीने को पानी ना मिला,
आंसूओ से प्यास बुझाई है।
देने को कुछ नहीं मेरे पास, बस दुआओं की झोली साथ लाया हूं।
कुछ दुवा तुम्हे दूंगा, कुछ कल की भूख के बदले दूंगा।
ना ख्वाहिश है पकवान की,
रूखी - सूखी खा, रात गुजारने आया हूं।
आज की भूख मिट जाए, कल की फिर मिटाऊंगा।
दे - दे कुछ निवाले, कई दिनों से कुछ ना खाया हूं।
रोटी ना सही, पीने को दे जल।
में फकीर बोहोत दूर से आया हूं।
बहुत की नफरत देखी, कुछ के गम सुने।
सबकी कहानी मैने सुनी, किसीने ना सुनी मेरे भूख की पुकार
बातें इस तरह बनाते थे;
ऐसा लगा रंजिश है मुझ गरीब से,
दस्तक दी बहुत दरवाजे पे, केवाड़ खोल कोई ना आया.
कमरे से आवाज़ कई सुनी मैंने, लेकिन मेरी आवाज़ सुन द्वार पे कोई ना आया।
अब तो रोटी मुझे भ्रम सी लगने लगी,
मन सोच लेता है और मयदा खुद को भर लेता "सोच" के अनाज से।
तेरे दर से लौटा, फिर कहा जाऊंगा?
अगर रोटी ना दे सके, बता दे कहा है खुदा की मजार।
शिद्दत से काट लूंगा वक़्त,
बहाने बना लूंगा पेट से, यह कह कल खिलाऊंगा दो निवाले और।
खुदा के दरवाजे आया हूं, अब ना खाली जाएगी मेरी पुकार
अब जो गया खाली हाथ, जाऊंगा फिर किसके पास?
By Amritanshu Singh

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