Ek Khat Tumhare Naam
By Pratiksha Singh
यह सांसे अब बेजान पढ़ी हुई धूल सी लगती है
यह आंखें भी तो हर लम्हा अब लौ जगती है
कभी थके हुए इस चेहरे पर तुम हाथ फेर दो ना
कभी बैठो तुम भी पास मेरे दो बातें मुझसे कर लो ना
जब चोट खा कर आए थे तुम मैंने फूंक मारकर सेका था
जब रो कर चैन से सोए तुम मैंने तब भी खिड़की से देखा था
अब उम्र की इस रेत पर सुकून का महल बना दो ना
कभी बैठो तुम भी पास मेरे दो बातें मुझसे कर लो ना
माना अब कुछ कहने में थोड़ा वक्त सा लगता है
कांपते अल्फाजों को ध्यान से सुनना तुम्हें बोरियत सा लगता है
जितनी बेकरारी से इन्तज़ार किया था मैने तुम्हारे पहले लफ्ज़ों का
तुम भी मेरी बातों पर उतना ही गौर कर लो ना
कभी बैठो तुम भी पास मेरे दो बातें मुझसे कर लो ना
कितनी खुशहाली थी उस छोटे से जहान में
नोटों के बंडल नहीं सिक्कों की छनकार में
उस हसीन ज़िंदगी से मुझे थोड़ी सी मोहलत दे दो ना
कभी बैठो तुम भी पास मेरे दो बातें मुझसे कर लो ना
By Pratiksha Singh

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