Duniya Ki Nazron Se
By Pratiksha Singh
उलझा रहता हूं जिंदगी की जोड़-तोड़ में
और लोग समझते हैं बड़ा सुलझा हुआ इंसान है
तकलीफ में भी सुकून का घर ढूंढता हूं मैं
और लोग कहते हैं बड़ा आलीशान मकान है
यूं तो अक्सर गुम हो जाता हूं राहों में
पर नुमाइश नहीं करता वह बात अलग है
जरूरत महसूस होती है किसी सहारे की
पर फरियाद नहीं करता वो बात अलग है
उलझा रहता हूं जिंदगी की कशमकश में
और लोग कहते हैं बड़ा सुलझा हुआ इंसान है
तलाश कभी मुझे भी थी अपनों की
पर अब जो उभर के आया है वह एक तजुर्बेकार इंसान है
हम सफर में किसी साथ की तलब नहीं मुझे
हर राह में चिरागों की हसरत नहीं है
माना एक अरसे से तरस गया हूं बेबाक हसी को
पर अपनी हसी के बदले किसी का गम आज भी मंज़ूर नहीं मुझे
उलझा रहता हूं जिंदगी की जोड़-तोड़ में
और लोग कहते हैं बड़ा सुलझा हुआ इंसान हैं
अपने ख्वाहिशें उम्मीदों पर बांधे रखता हूं
और लोग समझते हैं बेफिक्री का आशियां है।
By Pratiksha Singh

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