Diye ki Lau
By Nilofar Iqbal Shedbalkar
दिए की लौ आखिर बुझी तो बुझी कैसे
क्या कुसूर था हवा का या किसी की शरारत थी
अगर शरारत थी भी तो किसकी
वो किसकी शरारत किसी और के घर की रोशनी ले गई
वो किसकी शरारत किसी और के घर सुकून ले गई
किस कदर सिसक सिसक कर रोया वो घर उस रात
ना किसिको पता चला और नाहीं किसको खबर हुई
क्युंकी उस रात अंधेरा इस कदर गेहरा था
की इंसान की शराफत ने बेमुरव्वती का नकाब ओढ लिया
फिर ना शराफत नज़र आई और नाहीं नज़र आई मुरव्वत
कांच का सामान घर में सजा हुआ तो बहुत अच्छा लगता है
लेकिन वही सामान जब गिर कर टूट जाए तो पैरो में भी तो चुभता है
हर चीज का एक दायरा है और हर किसिका एक मकाम
ना दिल दिमाग की जगह हो सकता है और ना दिमाग दिल की
तभीतो इन दोनो की कश्मकश हमेशा से चलती आई है
और शायद हमेशा चलती रहेगी........
By Nilofar Iqbal Shedbalkar

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