Digital India
By Pratik Prasun
ठंडी हवा, मधुर संगीत, और तेज़ रफ्तार,
काकी और बच्चे समेत, काका हुए सवार |
ट्रैफिक की माया में गाड़ी रुकी जो सिग्नल पे,
खिड़की पर खटखट पड़ी, “अल्लाह के नाम पर दे|”
हृदय विशाल काका ने मदद करने की ठानी,
जेब टटोलना शुरू किया, काकी ने पर्स छानी |
नोट निकले बड़े सारे, देने न लायक कोई,
आदत से काका पूछ पड़े, “क्या लोगे upi?”
आश्चर्य और विस्मय से याचक ने उनको देखा,
पीड़ा सहित थी मुख पर मुसकाहट की वो रेखा |
गलती का एहसास, काका को हुई बहुत ग्लानि,
सिग्नल ने रंग बदला अब गाड़ी थी बढ़ जानी |
निराश, हताश, मायूस भिखारी वापस हो लिया,
उस बोर्ड तले जो बोले की डिजिटल है इंडिया |
By Pratik Prasun

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