Devnagari (Hindi)
Updated: Sep 16, 2025
By Sonal Mathur
शाख पर लगे कुछ पत्ते,
कुछ हरे तो कुछ पड़ गए हैं पीले।
कुछ तेज़ हवा की रफ़्तार में,
छिटक कर उड़ गए हैँ मझधार से।
शाख पर लगे कुछ पत्तों से।।
जीवन के इस कल्पवृक्ष पर,
हम भी तो बन चले हैँ पत्तों से।
कभी खुशी के पल में सींचे हरे पत्तों से,
तो कभी दुःख की विरह में पड़े पीले पत्तों से।
शाख पर लगे कुछ पत्तों से।।
कष्ट के थपेड़ों में उथले-पुथले से,
बन गए हैँ हम भी उन पत्तों से।
प्यार की सावन, बूंढ़ की आंस में,
कई वर्ष बीत गए इस प्यास में।
खड़े हैँ राह में बने ठूठ की तरह,
शाख पर लगे कुछ पत्तों की तरह।
तूफ़ान बहुत आए हर मक़ाम पर,
आस नहीं टूटी इस पड़ाव पर।
हूँ इंसान मैं भी, भगवान का प्यारा,
मत समझो मेहेज़ मुझे माटी की काया।
फिर उठ खड़ा हो जाता हूँ सोचकर ये,
वृक्ष भी हरे हो जाते हैँ पतझड़ छोड़ करके।
शाख पर लगे कुछ पत्तों से।।
जोड़कर हिम्मत, शुरु कर देता हूँ,
टूटी हुई आस फिर जोड़ लेता हूँ।
इसी नई कोशिश के साथ खड़ा हो जाता हूँ,
शाख पर लगे उन पत्तों-सा फिर खिल जाता हूँ।
शाख पर लगे कुछ पत्तों से।।
By Sonal Mathur

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