Devnagari (Hindi)
Updated: Sep 16, 2025
By Sonal Mathur
माँ तो माँ होती है सुना था फिर क्यों मन में है शंका,
पहले जैसी तू नहीं क्यों इतना बदल गई है मां।
नही भाती हो जब लेकर फ़ोन बैठ जाओ कोने में,
अधूरा सा,शांत सा,थमा सा लगता है तेरे होने में।
खाना खाने बैठे हम साथ सोच टेबल पे,
नहीं भाती हो खाते जब ले लेती हो फ़ोन हाथ में।
छत पर घूमें पकड़ हाथ मेरा ढेरों से पल बिताते,
नहीं भाती हो जब छोड़ हाथ मेरा करो फ़ोन पर बातें।
अच्छा लगता है पढूं मैं और तू देखने आए,
नहीं भाती हो जब बैठी अलग कमरे में और फ़ोन तू चलाए।
सिर पर हाथ फेरकर मेरी नींद को तू बुलाए,
नहीं भाती हो जब देर रात फ़ोन पर पिक्कचर कोई निपटाए।
पापा के संग जचती हो जब सिर कंधे पर रख दो,
नहीं लगती हो अच्छी जब फ़ोन लिए उनसे दूरी पर बैठो।
मैं जब होता आस पास तू समय साथ बिताती,
नही भाती हो जब फ़ोन लिये बिन बात उंगलियाँ चलाती।
खाना जैसा भी हो हम शोक से ही खाते,
नही भाती हो जब फ़ोन तेरे साथ चौके मे भी आए।
अच्छा होगा वही ज़माना जब कहलाता ऑफलाइन,
बिखर गए हैं हर घर और खो गई हैं माँ कहीं।
नहीं चाहिए तकनीकी और नहीं चाहिए ऑनलाइन,
मुझे तो बस माँ चाहिए बस मेरी ऑफ्लाइन माँ।।
By Sonal Mathur

Comments