Devnagari (Hindi)
Updated: Sep 16, 2025
By Sonal Mathur
ख़यालों की नाव इस कदर गोते खाती है,
रूठ गए हैँ हम, अब बोलने की उनकी बारी है।
ज़िंदगी का दिया अब टिमटिमा रहा है,
सूख गया है तेल, पर फिर भी ऐठें जा रहा है।
क्या मिलेगा ग़मगीन खुदको बनाए जा रहा है,
अपनों से ही पैंच दिन-पे-दिन लड़ाए जा रहा है।
छोड़ कर सुख-चैन, ख़्याली पुलाव बना रहा है,
अकेले में रहना, अपने को समझाए जा रहा है।
नहीं जानता बच्चा, परिवार भूलता जा रहा है,
रिश्तों के महत्व को खोता जा रहा है।
किस कदर तन्हाई से निजाद तू पाएगा,
अकेला आया है और अकेले ही चला जाएगा।
ना यादें जोड़ पाएगा, ना बातें बोल पाएगा,
किस्से-कहानियों को अधूरा यूं ही छोड़ जाएगा।
खड़ा ठूंठ-सा बेज़ुबान बनकर रह जाएगा,
क्या अपने पीछे टूटी लड़ियां जोड़ पाएगा।
रहने दे ये हट, झुक कर देख सिमट-सा जाएगा,
एक छत के नीचे जब, अपनों में खुदको पाएगा।
कर मज़बूत मन को, अपनों में ही रह जाएगा,
बंधकर अनेक रिश्तों में फिर खिंचा चला आएगा।
नासमझ देर बस पहल की है, तू कर दिखा पाएगा,
एक कदम की दूरी है, हर कोशिश तू कर जाएगा।
उठा सर पर ज़िम्मेदारी, तू कर मिलने की तैयारी,
यह समझ लेना बसहैकि, आज मेरी बारी।।
By Sonal Mathur

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