Chattano Sa Mann
By Shlok Jain
चट्टानों से तक रा कर अक्सर तूफान भी अपना रूख मोड लेते है।
हौसले हिम्मत की तर्ज़ पर, अक्सर किस्मत भी रूह हर देती है।
ये सब बस एक सोच ही तो है,
जो उन पथरो में भी भगवान ढूंढ लेती है।
हौसले बुलंद, जस्बा जीतने का,
साथ खड़े हमराही बन जाते हैं।
जो ना हो खुद पे यकीन, तो सहारे खड़े भी बाजी जीत जाते हैं।
चट्टानों से टकरा कर अक्सर तूफान भी पलट जाते हैं।
डरते नहीं हम किसी से, बस खुद से खुद खौफ खाते हैं।
लड़ जाए जहान से, बस खुद से आंख ना मिला पाते हैं।
क्योकी आज भी खुद को अपनी नजरो में कहीं नीचा सा पाते हैं।
पर जंग अब खुद से भी होगी,
चाहे फ़तह हो या क़ुर्बानी।
अब न कुछ व्यर्थ होगी,
फिर चाहे तूफ़ान हो या आंधी ही,
क्यों ना टकराए, मगर चट्टानों न हिला करती है।
अभी तो उठा-पटक शुरू हुई है,
तेज हवाओ का रूख अभी भी कुछ नरम सा है,
अभी बाकी है तूफ़ान कई,
साथ उड़ा ले जाने की चाह जो रखते हैं,
पर हम भी है मजबूती से खड़े यहां,
क्योकी हवाएँ चाटनो को चाह कर भी एक गज ना हिला सकती है।।
By Shlok Jain

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