Bolti Hai Insaaniyat
By Marianne Salunkhe
बोलती है इंसानियत,
के ज़ख्मों को मरहम
लगाने का मज़हब नहीं होता ।
बोलती है इंसानियत,
के प्यासे को पानी पिलानेवाला
आज भी फरिश्ता है कहलाता ।
बोलती है इंसानियत,
के भूख को मिटानेवाले का
धर्म नही, पर कर्म है दिखता।
बोलती है इंसानियत,
के जिंदगी देनेवाली लहू का
सिर्फ जिस्म होता है अलग,
रंग नहीं भिन्न होता ।
इबादत है,
मंदिर में नतमस्तक हर मां,
नमाज पढ़ते हर अम्मी,
इनायत की नवाजिश है करती।
इबादत है,
के धर्म के हर पन्ने पर
करुणा और दया की
सीख देते हैं ईश्वर ।
बोलती है इंसानियत,
के पहचान देता, धर्म से पहले,
सिर्फ इंसानियत है,
बोलती तो सिर्फ इंसानियत है !
By Marianne Salunkhe

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