Blackout Bnaam Lockdown
By Arvinder Kaur
छिप जाओ घरों में, ब्लैकआऊट हो गया
बुझा दो बत्तीआं ब्लैकआऊट हो गया.
किसी एक भी तरफ दिख गई जो रौशनी
मारे जायेंगे सभी, चंद्र हो या चांदनी.
ये कैसा दौर आया है, रे, कैसा दौर आया
स्व-मानव मानवता का बैरी हो गया
क्यूँ ह्रदय से हमारे, ज़मीर खो गया.
बूढ़े-बाल सब, बेबस लाचार से
क्या बचेंगे हम, कैसे बचेंगे हम
ज़ुल्म अत्याचार से. ज़ुल्म अत्याचार से.
कुछ दिनों में जब सीज़फायर हो गया
जीवन में मानो फिर सूर्य उदय हो गया.
विनाश देख इस क़दर भी सूझ नहीं आई
बॉर्डर के आर-पार भी बसतें हैं बहनोभाई
क्यूँ न, एकदूसरे के बन जाएँ रहनुमाई.
जग सारे को घेर के कोविड फैला दिया
कुदरत ने भी अपना, अस्तित्व दिखा दिया.
बिना किसी भेदभाव हो गयी तालाबंदी
लॉकडाऊन ने सभी को घरों में बैठा दिया.
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लॉकडाऊन में बंद रिश्ते भी तालाबंद हो गये
एहसास प्यार के दिलों से खो गये.
इस लॉकडाऊन दौर में यदि, टेक्नोलॉजी, ब्लैकआउट हो जाती
रिश्तो से बची भावनाएं भी, गहरी नींद सो जाती.
ये तो इंसान को मोबाइल का सहारा था
जिस के दम् पर ये लॉकडाऊन गुज़ारा था.
ऑनलाइन पढ़ाई, वर्क फ्रॉम होम शुरू हो गया
टेक्नोलॉजी ने बढ़ा ही उपकार कर दिया.
न खुद के करीब हैं न ही परवरदगार के
ऊलजलूल हरकतों में जीवन बिगाढ़ते.
होश में तो स्वयं को खुद ही लाना होगा
फिर कुदरत न सज़ा दे ये डर बैठाना होगा ये भय बैठाना होगा
ये डर बैठाना होगा ये भय बैठाना होगा.
By Arvinder Kaur

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