Bitiya
By Amit Sethia
छम छम करती अपनी पायल से,
जब वो एक मुस्कान दे जाती है!
नन्हे नन्हे कदमों से,
वो एक ऊंची उड़ान भर जाती है!
कंधे से चिपकर मेरे,
खुद ही वो सो जाती है!
नन्ही सी अपनी अखियों से,
ना जाने क्या क्या सपने वो देख जाती है!
पूछती है मुझसे यू भोली सूरत बना,
क्यू हैं बंदिशे मुझे अपनी ही "आजादी" से!
क्यू है ये बेडिया मुझमें
अपनो के ही नजरो से!
लाचार सा हो जाता हूं मैं,
उसकी इस मासूम सवालों से!
हो जाता हूं मजबूर मैं भी,
अपनी ही परी के सपनो से!
हर बीते हुए पल के साथ,
खुद से एक ही सवाल करता हूं!
खयाल जो रखता हूं मैं उसका,
है ये प्यार मेरा या है मेरी "मजबूरी"!
By Amit Sethia

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