Bitiya
By Pratiksha Singh
धीमी सी पुकार पर दौडी चली आती है
नन्हें पैरों में छनकते घुँघरूओं में मुसकाती है
कभी हँसकर तो कभी रोकर खुद को जताती है......
गुडियाँ.....लाडो....चिडिया....न जाने कितने नामों से पुकारी जाती है।
नन्हे हाथों से उँगली पकडकर पिता का अभिमान बन जाती है।
माँ की परछाई यूँ ही नहीं कहलाती है
घर के आँगन को रंगोली से सजाती है....
हाथों की मेहँदी में बगिया समेट लाती है।
उसके हाथों की पहली रोटी उसके बड़े होने का एहसास कराती है ...
टेढ़ी मेढी़ वही रोटी फिर गोल गोल बन जाती है...
भाई से लड़ते लड़ते एक उम्र निकल जाती है।
अब तो शादी कर ही दो ...
रिश्तेदारों में बात चल जाती है ।
लाल जोडा़ पहनकर गुडियाँ फिर सयानी हो जाती है....
कल तक थी जो राजकुमारी आज वह रानी हो जाती है।
पिता की बात को जो पल में समझ जाती है....
पापा की वह बिटिया हमेशा उनकी ही कहलाती है।
By Pratiksha Singh

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