Bhookh,Sapna Ya Aadmi
By Aditya Kumar
कल जब खाना नसीब न होगा तो दर्द बेचूंगा आते वक़्त रास्ते में चित्तड़े छोड़े थे मैंने आशा है , रोटी उन चित्तडों को चुन मुझे ढूंढ लेगा
बासी रोटियां कुत्तों को खिलाया था उस दिन भूख नहीं थी दिल का दर्द बड़ा था किसी दिन तो भूख दिल के दर्द से बड़ा होगा उस दिन कुत्तों के मुँह से निवाला छीनूँगा
पेट भरा है आज सपने देखता हूँ कुछ लोग पेट भरने का सपना देखते हैं हो सकता है कभी पेट आत्मा को ललकारे उस दिन सपने बेचूंगा
फलक का चाँद चाहिए पूरा चाहिए
इसलिए आधी रोटी खा रहा हूँ चाँद की रौशनी उधार की है उससे दिनचर्या नहीं कटते आज को कल में बदलने के लिए धुप मलना पड़ता है नयननीर में और खून जलाना पड़ता है शरीर में
येसबचकोरकोक्यामालूम
उसेतोचाँदचाहिए
पूराचाहिए
पेटऔरआत्माकीजंगमें
कौनजीतेगा ?
ज़िन्दगीपेटभरनेसेनहींचलती
ज़िन्दगीकेचलनेकेलिएपेटभरनाजरुरीहै
भगतसिंहइतनेदिनोंतकभूकेरहे
पानीतकनहींपीया
उनेहभीकुछचाहिएथा
सोचताहूँयहाँकौनजीता ?
भूख ,सपनायाआदमी ?
By Aditya Kumar

Comments