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Bezubaan Raat

Mar 3, 2023
2 min read

By Nikita Gupta


दिन के सीने पर पाँव रख,

रात फिर से चढ़ रही ।

शाम को बरसी बूंदों को चख,

मिट्टी की सौंधी सी खुशबू, खिड़की से आ रही ।


सावन की वो ठंड़ी-ठंड़ी फुहारें,

कमरे की दीवारों को भी नम कर रहीं ।

दिन भर की थकान की आहें,

नींद की गोद में जाने को मचल रहीं ।


वो कसी हुई चादर से खिलता बिस्तर,

बिन सिलवटों का जैसे अपने पास पुकार रहा ।

टिमटिमाते तारें रात की चादर ओढ़े परस्पर,

चाँद अपनी चाँदनी से आसमान को सजा रहा ।


घड़ी की टिक-टिक, पंखे की खर-खर,

रात के सन्नाटे में गूँज रही ।

धीरे-धीरे करवटों से पलंग की चर-मर,

भी धुधंली-धुधंली सी कानों में पड़ रही ।


फिर शुरु हुआ वो खतरनाक सिलसिला,

एक जाना-अनजाना सा चेहरा मुझे बुला रहा ।

कहीं दूर अंधेरी गुफा में वो जाकर मिला,

उसको देखा है कहीं, पर कहाँ, याद नहीं आ रहा ।


गुफा में छिपकली थी, साँप और बिच्छु भी,

एक भयावह सी आवाज़ गुफा को शोरगुल कर रही ।

ये कौन सी जगह है, मैं तो यहाँ आई नहीं कभी,

दिल की धड़कने शताब्दी सी बढ़ रहीं ।


वो अनजान शख्स मुझे अकेला छोड़,

कहीं अंधेरे में गुम हो रहा ।

डर के मारे कुछ सूझे ना, जाऊँ किस ओर,

रो-रो कर बस मायूसी से दिल भर रहा ।





फिर अचानक एक परछाई दबे पाँव आई,

मेरा गला दबाकर मेरी साँसों को रोक रही ।

मैं ज़ोर-ज़ोर से चीखी-चिल्लायी,

पर मेरी आवाज़ मेरे खुद के कानों तक नहीं पहुँच रही ।


क्या हो रहा है मेरे साथ,

कुछ भी तो समझ में नहीं आ रहा ।

एक झटके से जब खुली आँख,

ये स्वप्न था जो मुझे सता रहा ।


फिर भी कुछ देर तक दिल में रह गई एक कसक,

क्या ये स्वप्न था या सच में ऐसा हो रहा ।

दिल और दिमाग की यह अजीब सी कशमकश,

के बीच में बेचारा मन फंस रहा ।


रात यूँ ही बढ़ती गई मद्धम-मद्धम,

शरीर तो रात भर सोता रहा ।

पर दिमाग तो सपनों के जाल बुनता गया हर दम,

विचलित हो-हो कर मन भी घोड़े दौड़ाता रहा ।


मन और दिमाग को शांत करते-करते,

रात अपना हाथ छुड़ा रही ।

सूरज की लालिमा तले, चिड़िया चूँ-चूँ कर-कर के,

नए सवेरे नए दिन को सजा रही ।


नई भोर के साथ नए फसाने,

पिछली रात का एक भी स्वप्न तो याद ना रहा ।

यूँ ही हर रात आते सपने, कभी सुहाने, कभी डरावने,

नींद तो मानो बस शरीर का ही गहना रहा ।


रात की गुम-नामी

में कितना कुछ बीत रहा ।

ये रात बेज़ुबान रह कर भी,

क्या-क्या कह जाती, जैसे कोई मूक चलचित्र चल रहा ।


By Nikita Gupta





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