Bezubaan Raat
By Nikita Gupta
दिन के सीने पर पाँव रख,
रात फिर से चढ़ रही ।
शाम को बरसी बूंदों को चख,
मिट्टी की सौंधी सी खुशबू, खिड़की से आ रही ।
सावन की वो ठंड़ी-ठंड़ी फुहारें,
कमरे की दीवारों को भी नम कर रहीं ।
दिन भर की थकान की आहें,
नींद की गोद में जाने को मचल रहीं ।
वो कसी हुई चादर से खिलता बिस्तर,
बिन सिलवटों का जैसे अपने पास पुकार रहा ।
टिमटिमाते तारें रात की चादर ओढ़े परस्पर,
चाँद अपनी चाँदनी से आसमान को सजा रहा ।
घड़ी की टिक-टिक, पंखे की खर-खर,
रात के सन्नाटे में गूँज रही ।
धीरे-धीरे करवटों से पलंग की चर-मर,
भी धुधंली-धुधंली सी कानों में पड़ रही ।
फिर शुरु हुआ वो खतरनाक सिलसिला,
एक जाना-अनजाना सा चेहरा मुझे बुला रहा ।
कहीं दूर अंधेरी गुफा में वो जाकर मिला,
उसको देखा है कहीं, पर कहाँ, याद नहीं आ रहा ।
गुफा में छिपकली थी, साँप और बिच्छु भी,
एक भयावह सी आवाज़ गुफा को शोरगुल कर रही ।
ये कौन सी जगह है, मैं तो यहाँ आई नहीं कभी,
दिल की धड़कने शताब्दी सी बढ़ रहीं ।
वो अनजान शख्स मुझे अकेला छोड़,
कहीं अंधेरे में गुम हो रहा ।
डर के मारे कुछ सूझे ना, जाऊँ किस ओर,
रो-रो कर बस मायूसी से दिल भर रहा ।
फिर अचानक एक परछाई दबे पाँव आई,
मेरा गला दबाकर मेरी साँसों को रोक रही ।
मैं ज़ोर-ज़ोर से चीखी-चिल्लायी,
पर मेरी आवाज़ मेरे खुद के कानों तक नहीं पहुँच रही ।
क्या हो रहा है मेरे साथ,
कुछ भी तो समझ में नहीं आ रहा ।
एक झटके से जब खुली आँख,
ये स्वप्न था जो मुझे सता रहा ।
फिर भी कुछ देर तक दिल में रह गई एक कसक,
क्या ये स्वप्न था या सच में ऐसा हो रहा ।
दिल और दिमाग की यह अजीब सी कशमकश,
के बीच में बेचारा मन फंस रहा ।
रात यूँ ही बढ़ती गई मद्धम-मद्धम,
शरीर तो रात भर सोता रहा ।
पर दिमाग तो सपनों के जाल बुनता गया हर दम,
विचलित हो-हो कर मन भी घोड़े दौड़ाता रहा ।
मन और दिमाग को शांत करते-करते,
रात अपना हाथ छुड़ा रही ।
सूरज की लालिमा तले, चिड़िया चूँ-चूँ कर-कर के,
नए सवेरे नए दिन को सजा रही ।
नई भोर के साथ नए फसाने,
पिछली रात का एक भी स्वप्न तो याद ना रहा ।
यूँ ही हर रात आते सपने, कभी सुहाने, कभी डरावने,
नींद तो मानो बस शरीर का ही गहना रहा ।
रात की गुम-नामी
में कितना कुछ बीत रहा ।
ये रात बेज़ुबान रह कर भी,
क्या-क्या कह जाती, जैसे कोई मूक चलचित्र चल रहा ।
By Nikita Gupta

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