Bandhan
By Pooja
मैं हू एक पिंजरे का पंछी, ये ढुनिया मुझे सताती है।
आदत हो गई है बंधन की, अब पंख न मुझको भाती है॥
तरस रहा देखन की खातिर, की बगिया कैसे लहराती है।
कैसे आता है पतझड़ कैसे कोपल बन जाती है॥
कैसे सागर के किनारे कोई सीप चटकाती है।
कैसे सूरज की किरणें, आँखों में ज्योति जलाती है॥
कैसे चलती मस्त हवाएँ, कैसे वो नगमें गाती है।
कैसी है मुस्कान जगत की, कैसे धरती शरमाती है॥|
कैसे होती रात चॉढ़नी, कैसे काली हो जाती है।
अब देख -देख पंख मेरे, मेरी आँखें मुझे कह जाती है॥
तू है एक पिंजरे का पंछी, यह बार-बार बतलाती है।
राह निहारे बेचारे, पर सुनने में बात न आती है॥
कोई तो आके कहें मुझसे, कि कोई आजादी तेरी चाहती है।
मैं हूँ एक पिंजरे का पंछी, ये ढुनियाँ मुझे सताती है॥
By Pooja

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