Banaras
By Sumeet Kumar
वो गालियां ,वो मोड़ें,
वो चबूतरे,वो सिरहाने,
वो साड़ीमशीन की ठप-ठप आवाज़ें
वो अज़ान,वो मंदिर का घंटा,
वो चाय पर चर्चा-ए-चापलूसी,
वो उस झरोखे से झांकती हुस्न-ए-खामोशी
नाजाने क्यों आज भी वो शामें याद आती है
बैठे-बैठे ही ज़िन्दगी एकबार फिर बनारस हो जाती है।
By Sumeet Kumar

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