Apna Sath
By Rinkal Tyagi
क्यूँ चाह है तुम्हे किसी के साथ की
तुम खुद अपना साथ बनो
तुम खुद अपना हाथ बनो, क्या इतना काफी नहीं ।
बात करो- उस हाथ में थामी हुई बोतल से
राह में थमे हुए पेड़ों से
आसमां में उड़ती चिड़िया से
उस हाथ में खेलती गुड़िया से
हाँ, बात करो उन सबसे जो चाहते हैं कब से
चंद लोगो के लिए, मत बैर करो इन सबसे
निर्जीव ही सही, निःस्वार्थ तो हैं
सुनने को तुम्हारी कहानी, साथ तो हैं
माना सांत्वना नही दे सकते, पर दिल का हाल तो सुन सकते हैं
भार में डूबे इस दिल को, हवा में लहरा तो सकते हैं।
जिंदगी
जिंदगी एक समंदर है
जिसकी गहराई का कोई सार नही
क्यूं जाना उस गहराई में है
जिसके अंत का कोई पार नही
कहीं यादों का तूफ़ान है, तो कहीं सपनों का बवंडर
सुनामी का शोर हर तरफ है, शांति तो बस तट पर है
राह में चलते हुए थकें तो रुक जाते हैं
पर गहराई में तैरते हुए कहां थम सकते हैं
एक समय के बाद खुद का ही वज़न बोझ बन जाता है
भूली बिसरी यादों की लहरों में, खुद ही बह जाता है
सुकून तो बस उस गहराई के अंत में है
जहाँ की कल्पना सिर्फ मन में है
गहराई में पहुंचे भी, तो आसमां कहां दिख सकता है
उड़े गर आसमां में तो, गहराई में कहां फिर सकते हैं
गहराई की चाह है या आसमां की छलांग है
एक ओर सुकून है तो एक ओर उड़ान है
आसमां की उड़ान और गहराई का सुकूं, कहां साथ मिल सकते हैं
चयन है हमारा, कि किस ओर चल सकते हैं।
By Rinkal Tyagi

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