“सूखा पेड़”
Updated: Jun 5, 2023
By Someshwar Pandeya सोमेश्वर पांडेय
तुमने तो कुल्हाड़ी
नहीं-नहीं, स्वचालित
आरी लेकर इक पल में
काट दिया उस पेड़ को और
धराशायी कर दिए वो अहसास
अनुभव, भावनाएं जो पिछले
कई दशकों में, कई पीढ़ियों ने
इससे पाले थे।
क्या कहा तुमने कि क्या हुआ
इक सूख पेड़ ही तो था
गिर जाता – नुकसान करता
आखिर सूखा पेड़ ही तो था।
नितांत मूर्ख हो तुम
शून्य संवेदना युक्त
पास आओ देखो इस
विशाल पेड़ को
जिसे तुमने टुकड़ों में
क्षत – विक्षत कर
असहाय कर दिया
देखो इसकी जड़ से
दौड़ती इन असंख्य चींटियों
को, जैसे भूकंप के समय तुम
अपने घर छोड़ बाहर भागते हो
कहोगे विवशता है, हाँ जब घर गिरता है
तो बचने हेतु भागना विवशता ही तो है
ऐसे ही ये चींटियाँ भाग रही हैं
अपने खाद्यान्न और अजन्मे बच्चों को लेकर
एक सुरक्षित स्थान की ओर
और पास आओ देखो
इस पेड़ के सूखे तने पर
ये छोटे - छोटे सुराख
कितने सटीक, कितने साफ
क्या कारीगरी है !
हाँ कठफोडवे ने अपनी कला दिखाई है
और ये ऊपर बड़े तने के जोड़ पर जो
कोटर तुम्हें दिख रहे हैं न
इनके आगे लाक्षागृह की सुरंग
की कुशल कारीगरी भी छोटी पड़ जाए
मैंने देखा है तोता-मैना के बच्चों को
इन कोटरों में लुका छिपी खेलते हुए
और वो सबसे ऊपर टहनी पर
सूखा हुआ मोम
देख रहे हो,
अरे यह वही है
जिसके छत्ते की
मक्खियों को तुमने
धुआँ कर उड़ा दिया था और
फिर शहद बाँट लिया था
हां, आज भी खांसी होने पर
मैं, बच्चों को वो शहद देता हूँ
तुम भी और कृतघ्न सभी देते होंगे,
तुमने ये सोचा
हर सुबह बालकनी और खिड़की
से इस सूखे पेड़ और इस पर
आने वाले तमाम पक्षियों को
देखने के आदी हमारे बच्चे
क्या महसूस कर रहे होंगे
मुन्ना खिड़की में खड़ा
पेड़ को कटते देख रो रहा था
मुझसे एक ही प्रश्न कर रहा था
कि यह सूखा पेड़ किसी को
क्या तकलीफ दे रहा था
मैंने कहा कोई नहीं
पेड़ भला कब किसी को
तकलीफ देते हैं
ये तो कट कर भी
किसी की जेब गरम करेगा
इसकी छोटी - छोटी खपाँचे
किसी का चूल्हा जलाकर
बच्चों की रोटी का साधन बनेंगी
मेरे लिए मुश्किल था उसको समझाना
और तुम्हें भी कि इस सूखे, पर
कई सपनों के आश्रयदाता
को मत काटो।।
By Someshwar Pandeya सोमेश्वर पांडेय

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