Agar Zindagi
By Nilesh Bansod
अगर जिंदगी माने ना कभी तो फिर बेरुखी ही सही,
अगर खुदा भी माने ना कभी तो फिर बेरुखी ही सही
कितनी शिकायतें हैं पर जीने की आस नहीं रूठी,
वक़्त बुरा रहा पर ख़्वाबों की बात नहीं छोडी
जेब खाली थी पर उम्मीदों से बड़ी थी,
मेरी जिंदगी ना जाने किस मोड पर खड़ी थी
तेरे दरवाजे ही गिरा हूं जब भी हारा हूं
तेरे सुनने के लायक नहीं, क्या इतना बुरा हूं?
मैं मेरे हालपे सही, तू तेरे आशियाने सही
मेरी परवाज़ मेरी बुलंदियां देख रही है
तुझे तेरी ज़िद सही
दिल टूटकर भी लडना है, पर तुझे तेरी नाराजगी सही
अगर जिंदगी माने ना कभी तो फिर बेरुखी ही सही
जो खालीपन सा, दिल को लगता है,
किसी के ना होने का एहसास खलता है
धूप जैसा छाव,आग जैसे पाने को धुंडे हैं
मेरा दर हमेशा तेरी आस देखता है
ये जो खूबसूरत, हँसी और नमी है,
पलक झपकाये दोनों भी अजनबी है
मुझको खबर क्या, मुझे पता है,
छोटे सें झरोखे में मिली जिंदगी है
दरवाजा खुला है मेरे घर का,
तेरे दस्तक का इंतजार है
आखिर तू था तू ही है मेरा
जिसपे मेरा हिस्सा उधार है
अब तेरे हवाले , जो तू करें बाकी वो ही सही
अगर जिंदगी माने ना कभी तो फिर बेरुखी ही सही
By Nilesh Bansod

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