Aatm Parichay
Updated: Aug 26, 2025
By Jwala
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
इक किताब का किरदार हूँ, हर पन्ने पे बदल जाता हूँ
इक मरघट का सन्नाटा औ’ इक जमघट मैखानों का
मैं दिनकर इनके ही खातिर शाम ढले, ढल जाता हूँ
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
इक थूहर(cactus) का पौधा हूँ, मरु में भी मुस्काता हूँ
है बरहम शम्स फ़लक में यूं, कि
वो मुझको आंख दिखता है, मैं उसको आंख दिखता हूँ
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
इक शायर का ख़याल हूँ, जो बनूं ग़ज़ल बन जाता हूँ
शमशीर-कटारों-भालों की सब धार ख़त्म हो जाती है
मैं खड़ा मृत्यु की चौखट पर जब जीवन के गीत बनाता हूँ
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
इक, भविष्य का, माली हूँ, कागज़ के फूल बनाता हूँ
लहरें तो आती-जाती हैं, फिर उनसे क्या घबराना
मैं कलाकार तट पर जाकर बालू के महल बनाता हूँ
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
इक अधजली तस्वीर हूँ, कितने ही किस्से सुनाता हूँ
इक कविता उसके लिये लिखी थी, अब वो नही रही तो क्या
वो कविता उसकी कब्र पे जा उसको हर रोज़ सुनाता हूँ
क्या बताऊँ अपनी पहचान मैं?
इक किताब का किरदार हूँ, हर पन्ने पे बदल जाता हूँ ।।
By Jwala

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