Aas Ka Deep
Updated: Sep 16, 2025
By Sudha Rani
आज फिर पूछ बैठी मैं,
फिर वही सवाल,
क्यों हो इस तरह उदास,
क्या कुछ भी बचा नहीं।
हो अंधकार कितना भी ,
उजाला होगा जरूर,
है तेरे दिल में अभी ,
आस का दीपक बुझा नहीं।
है साथ तेरे वो साया तेरा,
अभी भी वहीं पर,
है बात बस इतनी सी,
अंधकार में तुझे ,
वो दिख अभी रहा नहीं।
क्यों सोच कर बैठ गए ,
अंत इन दुखों का नही,
है कौन सी वो रात ,
जिसकी सुबह नहीं।
पकड़ कर दुखों के दामन को,
बताओ क्या पाओगे तुम,
हर सुख है तेरा अपना ,
बस तूने उसे छूआ नहीं।
आँसूओं को न दो,
अपनी पलकों में जगह,
तेरे ख्वाबों को मिल पा रही,
इनमें जगह नहीं।
तेरी हर धड़कन का,
एहसास है मुझे,
तेरे दिल का कोई भी दुख ,
मुझसे छुपा नहीं।
आ एक बार फिर से,
सोच कर देखें जरा,
है कौन सी वो रात,
जिसकी सुबह नहीं।
है कौन सी वो रात जिसकी सुबह नहीं....
By Sudha Rani

Comments