ज़ख्म
Updated: Jun 10, 2023
By Nitika Soin
अब फ़िक्र छोड़ो इस ज़माने की
तुम्हे इजाज़त है मुझे आज़माने की।
आगाज़-ए-उल्फत में तो दीवानगी संभाल लेती है,
फिर ज़रुरत पड़ती है नए बहाने की।
तपती रेत ने जिन पाँव का रोना देखा था,
गुल-ए-तर से पुर है ज़मीन उसके आशियाने की।
जो ज़ख्म छिपा के रखे थे, मैंने भर दिए तो रूठता क्यों है,
मगलूब भी है तो दाद दे मेरे निशाने की।
तू अभी फ़िगार है मेरे पाँव पे रख रख के पाँव चल,
अभी न कर ज़िद नए रास्ते बनाने की।
तू तो तक़दीर पे यकीन भी नहीं करता,
क्या है तक़रीब तेरे टूट के बिखर जाने की।
तेरे आने से पहले मैं दिल पे हाथ रख लेता हूँ,
तेरी ज़ेबाई को आदत है मुझे चौंकाने की।
By Nitika Soin

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