बूंद,'
By Vidushi Parekh
मैं इक पानी की बूंद
जिस रंग ढालो मैं ढल जाऊं
नदी झरने सागर में लहराऊं
टप टप टप जब भी बरसुं
सीपों में मोती बन जाऊं
आंखों से जो झर झर बरसुं
सुख दुःख की सौगात कहलाऊं
पर आज बदल गया है मंजर
सरिताओं के पट हो गये बंजर
जल संचय कर बन जाओ इंजर
खुले नलों को झट से बंदकर
कारों , घरों को नहलाने में
पानी यूं व्यर्थ व्यय मत कर
होली रंगों का त्यौहार
पानी बिना मना ले यार
भूजल उर्जा का आधार
पेड़ लगा ,कर नवसंचार
सभ्यताओं की कहानी गाती
आज प्रदूषित हो हूं रूआंसी
आज तुम्हारी प्यास बुझाती
कल बनूंगी तलाश अबूझ सी
पानी बिना सब है सून
पर! पानी तो हो रहा है गुम।
By Vidushi Parekh

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