बचपन
By Mohit Kumar
याद है बचपन की वो कहानियाँ जो दादी सुनाती,
और मुस्कुरा के अपनी जादुई लाल पोटली से दो रुपए दे देती।
उनकी कीमत नहीं लगा सकता आज मैं,
अनमोल रत्न थे वो कहानियाँ और सिक्के।।
गलियों में गस्ती लगाना और शाम को वापस घर लौट आना, बस यही जिंदगी थी मेरी,
कार्टून देख कर ठहाके लगाना और माँ के हांथो से खाना खाना, यही दुनिया थी मेरी।
आज भी माँ खिला देती है कभी अपने हाथों से यूँही,
और मैं टीवी पे फिल्में देखता खा लेता हूँ।।
बचपन की धूप भी बड़ी कोमल हुआ करती थी,
दिनभर मैदान में खेल लो फिर भी मुस्कान बुझा नहीं करती थी।
पर जाने क्यों माँ भूखी रहती मेरे घर वापस आने तक,
और आने पर मार लगाती, फिर उन्ही हाथों से खाना खिलाती, उसके पेट भरने तक।।
याद है वो लड़कपन का प्यार भी जो ख्वाब था कोई जैसे,
देखने उसे उसके घर के चक्कर लगाता, मंदिर हो ऐसे।
अब तो दिल खोल के भी रख दूँ तो लोग हँस के निकल जाते हैं,
शब्द नहीं कि बता सकूँ वो यादें कितने एहसास लाते हैं।।
बाप की मार का डर हमेशा बना रहता था मन मे मेरे,
रविवार भी दफ़्तर मे ही बीते उनकी सोचता वरना मार पड़ेगी बेटे।
अब जब मैंने दफ्तर जाना शुरू कर दिया है उनसे दूर,
सोचता हूँ मार ही मिल जाती रविवार चाहे बिना किसी कसूर।।
अब घर आना जाना भी कम होता है, माँ बोलती है अब बड़ा हो गया हूँ मैं,
पापा भी खुश हो लेते है ये सोच कर कि अपने पैरों पे खड़ा हो गया हूं मैं।
कैसे कहूँ की इस जमाने मे वो बात नहीं जो आपके लाड और मार मे थी,
अब कार्टून, पैसे, खेल और गस्तियों में वो एहसास नहीं जो आपको सताने मे थी।।
By Mohit Kumar

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