नारी...
By Dr. Suboohi Jafar
नारी तुम शक्ति हो, भक्ति हो,
प्रभु की लीला की अभिव्यक्ति हो,
कण- कण में तुम, कल- कल में तुम,
तुम सृष्टि की विज्ञप्ति हो|
तुम ही पुत्री, तुम ही सखी,
तुम ही बहन, तुम ही माँ हो,
तुम ही प्रेमिका, तुम ही पत्नी,
तुम ही इस जहॉं का आसमाँ हो|
कमज़ोर नहीं हो, कोमल हो,
आज़ादी की नींव हो, मील का पत्थर हो,
त्याग की सूरत, ममता की मूरत हो,
देवी का प्रारूप हो, ईश्वर का आशीर्वाद हो|
माँ सरस्वती के समान कण्ठ में विराजमान हो,
माँ काली के समान दुष्टों की विनाशक हो,
माँ लक्ष्मी के समान समृद्धि का प्रतीक हो,
माँ दुर्गा के समान साहस का आधार हो|
योद्धा बन हर परिस्तिथि में परिवार की रक्षक हो,
ममता का आँचल फैलाए, तुम सबका रक्षा कवच हो,
सहजता और सरलता का जीता जागता प्रमाण हो,
मुस्कुरा कर पार कर जाए जो सारे विघ्न, तुम वह बाण हो|
नारी बेचारी है, अबला है, यह कहकर शोषित बहुत हो चुकी हो,
अब न सुनेगी, अब न सहेगी, तुम सशक्तिकरण की प्रेरणा हो,
आँसुओं की अविरल धारा हो, सहनशीलता, साहस और शक्ति का पिटारा हो,
जगत जननी, स्वाभिमानी, सर्वगुण संपन्न हो|
समाज की नई आशा हो, बुलंदी की परिभाषा हो,
नई सभ्यता, नया ज्ञान, तुम ही संस्कृति की नींव हो,
वात्सल्य प्रेम से ओत- प्रोत, दया त्याग की मूरत हो,
कभी लक्ष्मी बाई, कभी सरोजिनी नायडू, तुम ही महादेवी वर्मा हो|
आशा पल्लवित, ऑंखों में पोषित, तुम ही नए भारत की पहचान हो,
हर व्यवहार में सक्षम, तुम ही नीड़ का निर्माण हो,
इंदिरा गाँधी, प्रतिभा पाटिल या फिर द्रौपदी मुर्मू,
आदिसेअंततक, नारी... तुममहानहो|
By Dr. Suboohi Jafar

Comments