नारी
By Mrityunjay Kumar Pandey
मैं नारी ममता की मूर्ति
मैं तनया बंधन की कीर्ति
मैं जाया हूँ दैव के वर से
मैं जननी का श्रृंगार सखी ।
कब तक मैं मोम
सी पिघल-पिघल
करती रहूँ स्वयं
का बलिदान सखी ।
कब तक मैं जलूँ
विकराल जगत में,
प्रज्ज्वलित होकर अदम्य
मशाल सखी ।
कब तक सरिता बन
तोड़ती रहूँ मैं ,
प्रस्तर-रूपी बंधन का
हर तार सखी ।
कब तक बँधी रहूँ
असीमित सीमा में ,
करती मैं अटल
उद्गार सखी ।
हिय जो कभी मेरा
है व्याकुल हो जाता ,
मन भ्रांत हो
बारिद बन जाता ।
पिरोए जाता है
शब्दों का हार सखी ।
नयन जो कभी मेरे
ढूँढते हैं उपवन में
सुमन अद्वितीय
करने को श्रृंगार सखी ।
मैं बन जाती एक
अडिग उमंग , सुरभि
अगणित महकाती पवन,
पा बस एक मधुर अभिधान सखी।
कब तक बँधी रहूँ
असीमित सीमा में ,
करती मैं अटल
उद्गार सखी ।
भरती हूँ जो मैं
अंजन नयनों में
बनते हैं ये
अश्रु श्रृंगार सखी ।
आँचल में संजोए मोह हमेशा
मैं ढूँढती हूँ –
कण-तन-मन में
स्नेह सुधा की धार सखी ।
कब तक बँधी रहूँ
असीमित सीमा में ,
करती मैं अटल
उद्गार सखी ।
मन कभी है
मुस्कान जो भरता ,
इसे देख-देख उर
प्रतिक्षण है जलता ।
फिर कैसे हो उपवन में
कलियों का विस्तार सखी ।
कब तक बँधी रहूँ
असीमित सीमा में ,
करती मैं अटल
उद्गार सखी ।
श्वास मेरी मंद होती ,
मुस्कान मेरी चुप सी होती ,
बल भी मेरा
क्षीण होता जा रहा ।
उद्गार भी है बँध चला
अब बेड़ियों में ।
फिर कैसे कहूँ
नारी जीवन का हार सखी ।
कब तक बँधी रहूँ
असीमित सीमा में ,
करती मैं अटल
उद्गार सखी ।
By Mrityunjay Kumar Pandey

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