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नारी

Nov 15, 2022
2 min read

By Mrityunjay Kumar Pandey



मैं नारी ममता की मूर्ति

मैं तनया बंधन की कीर्ति

मैं जाया हूँ दैव के वर से

मैं जननी का श्रृंगार सखी ।


कब तक मैं मोम

सी पिघल-पिघल

करती रहूँ स्वयं

का बलिदान सखी ।


कब तक मैं जलूँ

विकराल जगत में,

प्रज्ज्वलित होकर अदम्य

मशाल सखी ।


कब तक सरिता बन

तोड़ती रहूँ मैं ,

प्रस्तर-रूपी बंधन का

हर तार सखी ।


कब तक बँधी रहूँ

असीमित सीमा में ,

करती मैं अटल

उद्गार सखी ।


हिय जो कभी मेरा

है व्याकुल हो जाता ,

मन भ्रांत हो

बारिद बन जाता ।


पिरोए जाता है

शब्दों का हार सखी ।





नयन जो कभी मेरे

ढूँढते हैं उपवन में

सुमन अद्वितीय

करने को श्रृंगार सखी ।


मैं बन जाती एक

अडिग उमंग , सुरभि

अगणित महकाती पवन,

पा बस एक मधुर अभिधान सखी।


कब तक बँधी रहूँ

असीमित सीमा में ,

करती मैं अटल

उद्गार सखी ।


भरती हूँ जो मैं

अंजन नयनों में

बनते हैं ये

अश्रु श्रृंगार सखी ।


आँचल में संजोए मोह हमेशा

मैं ढूँढती हूँ –

कण-तन-मन में

स्नेह सुधा की धार सखी ।


कब तक बँधी रहूँ

असीमित सीमा में ,

करती मैं अटल

उद्गार सखी ।


मन कभी है

मुस्कान जो भरता ,

इसे देख-देख उर

प्रतिक्षण है जलता ।


फिर कैसे हो उपवन में

कलियों का विस्तार सखी ।


कब तक बँधी रहूँ

असीमित सीमा में ,

करती मैं अटल

उद्गार सखी ।


श्वास मेरी मंद होती ,

मुस्कान मेरी चुप सी होती ,

बल भी मेरा

क्षीण होता जा रहा ।


उद्गार भी है बँध चला

अब बेड़ियों में ।


फिर कैसे कहूँ

नारी जीवन का हार सखी ।


कब तक बँधी रहूँ

असीमित सीमा में ,

करती मैं अटल

उद्गार सखी ।



By Mrityunjay Kumar Pandey





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