नारी
By Seema Kaushik "Mukt "
हाँ ! मैं पहेली हूँ
मानती हूँ !
उसे पता भी नहीं
मैं उसके बारे में
कितना जानती हूँ ..
वो मुझे पढ़ने का
दावा करता है ,
मैं उसे शोध का
विषय मानती हूँ..
“नारी “हूँ !
ऋषि मुनि भी ना
जान पाए मुझे !
मैं उसके हर वार को
पहचानती हूँ !..
सुन तन से ऊपर उठ
मन की तह में पहुँच !
तो ही पा सकेगा मुझे !
ये वो कर नहीं पायेगा
मैं ये जानती हूँ !
चारों तरफ शोर
सिर्फ सच्चे प्यार का,
इसी को बनाया सभी ने
मेरे लिए जाल
मानती हूँ !
सुन समय की धारा में
मेरे साथ बह ले ,
इसी में है सच्चा सुख !
कोई सुलझा नहीं सकता मुझे
जब मैं ठानती हूँ …
By Seema Kaushik "Mukt "

Comments