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दहेज

By Sia Mishra


 गर्मी  का मौसम, शरीर को जला देने वाली कड़ाके की धूप, ऐसा लगता था किसी से भयंकर बदला लेना चाहती है। तिलतिलाती धूप में पेड़ भी थोड़ी सी छाया प्रदान करते हुए संकोच कर रहे थे। वैसे इस मौसम ने छाया प्रदान करने के लिए छोड़ा ही क्या था उनमें- केवल सूखे डंठल। इस हृदय-भेदी गर्मी में ये सूखे पेड़ फिर भी आराम दायक होते हैं। लेकिन उस भयानक लंबे-चौड़े ऊसर में तो मुझे कोई पेड़ दिखाई नहीं पड़ रहा था, जिसके नीचे थोड़ी साँस ले सकूँ। 

कॉलेज जाने में देरी हो रही थी। मैं जल्दी-जल्दी दौड़ रहा था, बार-बार दाईं ओर देखकर चल रहा था। मैं उस पेड़ की प्रतीक्षा में था जो रास्ते से दाईं ओर थोड़ी दूर पर दिखाई पड़ता था। अब तो मुझसे चला नहीं जा रहा था क्योंकि पैर बुरी तरह झुलस रहे थे। आखिरकार, पेड़ दिखाई पड़ा। मैं लपका, लेकिन तुरंत मेरी निगाह घड़ी पर पड़ी। थोड़ा ही समय शेष था अतः मैंने विश्राम करने का विचार छोड़ दिया और चाल थोड़ी तेज़ कर दी।

पेड़ के सामने से गुज़रते हुए मुझे वही बुड्ढा उसके नीचे बैठा हुआ दिखाई पड़ा जो पिछले साल लगभग इसी समय यहीं पर दिखाई पड़ा था। चूँकि उस रास्ते से बहुत ही कम लोग आते-जाते हैं, अतः मैंने अंदाजा लगाया कि यह वही आदमी होगा। रास्ते में मैं उसके बारे में सोचने लगा। यही था जिसको मैंने एक अन्तर्देशीय पत्र लिए हुए देखा था। वह उसको पढ़ने का निरर्थक प्रयत्न कर रहा था जब मैं सुस्ताने के लिए उसके पास पहुँच था, उसने मुझे सिर उठा कर देखा था तथा मुझसे कहा था, “बेटा, ज़रा यह चिट्ठी पढ़ि द्यो। भगवान तोहार भला करिहैं।” मैंने पढ़ा। लिखा था:

“ठाकुर साहब, मैंने आपकी लड़की देखी और मुझे अपने लड़के के लिए पसंद आ  गई। मैं अपने लड़के की शादी आपकी लड़की से ही करूंगा लेकिन आप तो जानते ही हैं कि उसकी पढ़ाई मैं कितना कुछ खर्च कर दिया। मुझे आशा है कि आप मेरी बात समझ चुके होंगे और मुझे पाँच हज़ार रुपये दक्षिणा के रूप में देने की कृपा करेंगे। वैसे मैं इस बात को इसलिए दृढ़ता से कह रहा हूँ क्योंकि जहाँ तक है यह  धन-राशि और लोगों की माँगी हुई राशि से कम होगी जो आपकी लड़की देखने आए होंगे।”

पत्र का वह भाग फटा हुआ था जहां भेजने वाले का नाम और पता इत्यादि रहता है। शायद जेब में रखे-रखे या और किसी वजह से ऐसा हो गया था। लेकिन मैंने देखा कि बुड्ढा यह बात समझ गया होगा कि पत्र भेजने वाला कौन था। 

मैंने देखा था की बुड्ढे के मुँह से तब तक ‘आह’ निकल गई थी जब पाँच हज़ार का नाम सुना था। शायद वह किसी तरह इतनी रकम नहीं जुटा सकता था, बेटी की शादी के लिए। लेकिन बेटी की शादी तो करनी ही थी। शायद उसने परिश्रम करके, मजदूरी करके पैसे जुटाने की बात सोची होगी। 

उसने मुझे धन्यवाद दिया था और मैं क्लास जाने के लिए चल पड़ा था...। 

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शाम के चार बज गए थे। कॉलेज में छुट्टी हो गई थी और मैं अकेले फिर उसी जाने-पहचाने रास्ते से पैदल चल पड़ा। धूप अब इतनी कड़ी नहीं थी। जब मैं पेड़ के सामने आया तो मुझे किंचित आश्चर्य हुआ क्योंकि वह बुड्ढा ठीक उसी तरह से चौड़े तनेसे पीठ टिकाए बैठ था जैसा कि मैंने दोपहर को देखा था। मैं पेड़ के नीचे गया। देखते ही मैं पहचान गया कि यह वही बुड्ढा है जिसके बारे में मैं आज क्लास में सोच रहा था। लेकिन फिर भी साल भर में उसकी सेहत और उसके रंग में काफी फर्क पड़ गया था। 

उसका शरीर बिल्कुल थका हुआ लग रहा था। मैं थोड़ा और नजदीक गया। देखा कि वहाँ उसके हाथ की ऊँगलियों में वही पत्र अटका पड़ा था जिसको मैंने पढ़ा था। उसके साथ-साथ मैंने एक सफ़ेद कागज भी देखा। मैंने देखा कि बुड्ढे पर मेरे वहाँ पहुँचने की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुई। मैंने सोचा शायद सो रहा होगा। थकान के कारण नींद आ गई होगी। मैं और नजदीक गया, देखा कि शरीर का कोई भाग गतिमान नहीं है। मैंने उसका हाथ पकड़कर हिलाया। मेरे आश्चर्य की तब सीमा नहीं रही जब मैंने देखा कि वह मेरे हाथों में झूल गया था। वह हमेशा के लिए सो चुका था। 

मैंने सफ़ेद कागज वाला पत्र उठाया और पढ़ने लगा:

“मेरी प्रिय बेटी,

सदा खुश रहो।

 बेटी, मेरी तबीयत इस समय ठीक नहीं है। कोयला और पत्थर उठाते-उठाते मेरा शरीर अब बिल्कुल टूट गया है। मैं एक-दो दिन का ही मेहमान हूँ, मुझे ऐसा लग रहा है। लक्ष्मीनारायण, जो तुम्हें देखने के लिए गए थे, उन्होंने मुझे पत्र में बताया कि वे दहेज में पाँच हज़ार रुपये चाहते हैं। इसी लिए मैं तुमसे नहीं मिल सका और पैसे जुटाने के लिए पत्थर ढोने लगा, इस उम्र में। बेटी मैं रुपये भेज रहा हूँ डाक के ज़रिए। मुझे क्षमा करना बेटी, मैं तुम्हें आशीर्वाद देने नहीं आ सकता। सदा सुखी रहो। भगवान तुमहारे साथ हैं बेटी ………………..।”

पत्र पढ़ते हुए मुझे आश्चर्य के साथ दुख हुआ क्योंकि वह लक्ष्मीनारायण जी, जिनकी बात पत्र में थी, मेरे ही पूज्य पिताजी थे। मैंने बुड्ढे की जेब मे देखा। सौ-सौ के दस नोट थे...दहेज का पाँचवाँ भाग। 


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