दर्द
By Teri Kalam
“ कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥ ”
लिख रहे थे सब इश्क़ इबादत
कुछ हमने भी लिखना चाहा,
ज़्यादा तो कुछ मालूम नहीं
सब छोड़ छाड़ कर बस बिकना चाहा ।
“ सूरा सो पहिचानीऐ जु लरै दीन के हेत ॥
पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेत ॥ ”
बिकना चाहा तेरे बाज़ार में,
जहां बिकते नहीं तादाद में ।
जहां पुर्जा पुर्जा कटता है,
कटता सडता बिखरता है ।
बिखरता है बिखरता है,
बिखर बिखर कर बिकता है ।
बिकता हुआ फिर दिखता है कि,
क्या दर्दनाक सा दर्द है,
उस दर्द की दुनिया का ।
उस दर्द में छुपा दर्द,
उस दर्द को दिखता है ।
दर्द में डूब कर,
दर्द में बिखरता है ।
दर्द से निकल कर,
दर्द से निखरता है ।
दर्द में दर्द से जब दर्द को पाता है,
तो दर्द को पाकर दर्द दर्द ही हो जाता है ।
लिख रहे थे सब इश्क़ इबादत
कुछ हमने भी लिखना चाहा,
ज़्यादा तो कुछ मालूम नहीं
सब छोड़ छाड़ कर बस बिकना चाहा ।
By Teri Kalam

Comments