खयाल
By Vaishnavi Arun Sawant
कभी खयाल आता है की उड़ जाऊ।
भिड़जाऊ उन पंछियों की उड़ान को।।
कभी खयाल आता है की दौड़ लगाऊं।
भूल जाऊ सभी बंधन को।।
कभी खयाल आता है की तैरने लग जाऊं।
समा जाऊ पानी की गहराई को।।
कभी खयाल आता है की लिखती जाऊं।
बयां कर दू सारे शब्दों को।।
कभी खयाल आता है की गुनगुनाती जाऊं।
सुर में मिला दू अपने सुर को।।
कभी खयाल आता है की सो जाऊं।
हमेशा के लिए रोक दू सारे खयालों को।।
By Vaishnavi Arun Sawant

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