उलझन
By Shashank Kumar Sinha
मैं सूर्योदय की बेला हूं
तुम अमरदीप की संध्या
हमरा मिलन होगा कैसे ?
तुम आओगी तो भस्म हो जाओगी
और मैं आया तो उसके रश्मि में मिल जाऊँगा |
बेमतलब उत्तेजित मृत्यु से,
रात का इंतजार है अच्छा
पर यहां भी है तिमिर का पहरा
मैं आया तो भस्म हो जाऊँगा
और तुम आयी तो उसके तिमिर में मिल जाओगी |
मैं बसंत ऋतु की मादक बेला हूं
तुम रंगों का त्यौहार
हमरा मिलन होगा कैसे ?
बीच में है एक पहर का पहरा
मैं आया तो तुम्हारा समय काल बढ़ जाएगा
और तुम आई तो प्रकृति क्षतिग्रस्त हो जाएगी |
कहने को तो आसान है |
पर यह पहलू मचाता घमासान है |
यूँ ही नहीं कोई अमर हो जाता है |
ऐसे ही नहीं कोई प्रेमी कहलाता है |
जो सूर्य की आग को झेल जाता है |
तिमिर की गहराई को भेद जाता है |
विपरित समय को अनमोल बनाया है |
वही इस बंधन को निभा पता है |
अब ये हृदय और विलंब न सह पाएगा
अब मैं और दूर ना रह पाउंगा
क्यूँ न ऐसा हो
तुम काली घटा का श्रृंगार बनो
मैं सुखी धरती सा वीरान बनूँ
तुम मुझपर आ बरसना
मैं तुमको खुद में समा लूँगा |
तुम नदिया का उत्कृष्ट प्रवाह बनो
मैं नीले समुद्र सा विशाल बनूँ
तुम मुझमें आ कर समा जाना
मैंअमृतसामीठाहोजाऊँगा |

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