आवाज
By Kuldeep Rai
आकस्मिक आभार की आवाज में।
कुछ लूटे ,कुछ छूटे हुए , पल की आरती में।
आशा और पूजा की मझधार में।
कहा आया ! कहा गया ?
में ना राही , में ना खीवेइया।
में बस एक सारांश - कल और आज का।
नियत ऋतुओं के पतझड़ में,
जहाँ पत्तियाँ झड़ती हैं और कलियाँ खिलती है।
पानी बहेती , सूरज उगता।
चिड़िया चहकती, पेड़ पनपते।
में हूं यहां, बस हूं !
पर मेरा क्या , आदम हूं।
ना अर्थ है मेरे वजूद का।
ना आरंभ है इस रंगमंच का।
बस अन्त के आतंक का एहसास।
आकस्मिक आभार की आवाज में।
सब सुन सकू , सह: सकू, पर समझा ना पाऊं।
की कम की कमी । ज्यादा की लालच से नहीं।
बस अपनी आकार का प्रकार को न जानने से होगा।
By Kuldeep Rai

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