आदमी
By Ashish Shrivastav
आदमी गर आदमी बन जाएं
अहा तो फिर क्या कहां जाएं
इस क़दर हालात हैं बेइमानी का
ऐसे में इंसान फिर कहां जाएं
काली घटाएं छाई है इस तरह
पता नहीं कब बादल बरस जाएं
बहोत दिन हुए उसकी बात कहें
सोचता हूं उस पर ग़ज़ल कहां जाएं।
By Ashish Shrivastav

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