आतंक
By Uday Kumar
आज सारा विश्व आतंक के घेरा में है,
सत्तापद क्षेत्र विस्तार केफेरा में है !
यही वजह विध्वंस जगत का अपना-अपना फेरा है,
सारा विश्व आज आतंक के घेरा में है !
अस्त्र-शस्त्रका होड़ बनी है,
अपना वर्चस्व दिखाने में!
स्पर्धा तो खत्म हो गयी,
आतंक गलियारा में!!
आतंक की कड़ी जुटी है,
अभिमान-स्वभिमानो से !
जितने भी हम लोग यहाँ हैं,
दिल दिमाग़ के तारों से !!
कोई दुखी है,जीने को,
मुझको भी राहत मिलता!
कोई दुखी मिट जाने को ,
इस व्यवहार से डर लगता!!
मैं शोषण करता आया हूँ,
वह अपनी सीमा को लांघ रहा !
देखो कैसे वह अकड़ रहा है,
सारा हक अपना मांग रहा!!
मैं कैसे जी पाऊँगा,
उसके मूछो की ताओ में !
वह तो जीता आया है,
मेरे पैरो के दावों में !!
हक तो एक समान मगर,
लागू करने का क्या है अर्थ !
मैं ही मारा जाऊँगा,
अपना सर्वस्व गवाऊंगा!!
अब तो है बस एक रास्ता,
मिल-जुल कर आतंक फैलाएं !
कहीं लड़ें और कहीं लड़ाएं,
उथल-पुथल कर शोर मचाएं!!
आतंक का अंत कहाँ,
सोचें मिल-जुलकर गौर करें !
हल विनाशही लगे हमें,
पाण्डव सा हम सब कर्म करें!!
गीता पथ का सम्मान करें !!
मानवता पर पड़ी धूल,
कहने को तेरा ही कसूर!
न्यायी-अन्यायी कहलाता,
आतंकवाद का यही उसूल!!
चाहे बाईबल हो कुरान,
गीता का भी ऐसा ही ज्ञान!
कर्तव्य-अधिकार के बीच खड़ा,
लड़कर मरना है मोक्ष समान!!
दुराचार खत्म करने को,
अहिंसा का मार्ग चुन !
शक्ति संपन्नता को पाकर,
कभी नहीं अभिमान करें !!
दुराचार क्यों पनप रही है?
इस पर भी हम गौर करें!
क्यों मानव-मानव का दुश्मन,?
दानव बन कर बैर करें!!
शोषण की मुक्ति से सब को,
खुशी आनन्द उमंग मिले !
समानता सद्-विचार आज,
जन-जन का आधार बनें!!
शोषण कहाँ-कहॉं है अटका,
इसपर भी हम गौर करें!
धर्म-जाति का अंग है शोषण,
सामंतों का जंग है शोषण,
सम्प्रदायिक रंग है शोषण, हम,
तुम ,सब का व्यंग्य है शोषण !!
हर मजहब में अपनी मजहब की तस्वीर,
जब तक देख न पाएंगे!
देश-दुनिया से आतंक का जाल,
तब तक तोड़ न पाएंगे!
पाखंड के कारण आतंक आज पनप रहा है!
कर्तव्य हीनता के कारण ,पाखंडियों की ज्वाला है!
आतंक और पाखण्ड उसका माला है!
आज देखते अधिकांश का दिल काला है!!
आतंक मिटाने के लिए आवश्यक,
हृदय का संचार बदलना होगा!
प्रतिशोध भावना से हट कर,
सद्भाव परिवेश बनाना होगा!!
बदला नहीं बदलाव जरूरत,
जन-जन में पनपाना होगा !
हर भेदभाव से उपर उठकर,
आतंक मिटा स्वच्छ परिवेश बनाना होगा!!
By Uday Kumar

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