Papa
By Nitu Marwah
मौका जब भी प्यार दिखाने का आया,
पापा को हमेशा पीछे ही पाया।
माँ-बाप की साझेदारी में,
क्यूँ ले गई ममता सारे नंबर,
क्या पिता के प्यार का, कोई मोल नहीं हमारी ज़िंदगी के अंदर?
आँखें तो भीगी थी पापा की भी,
जब लिया था पहली बार गोद में।
हैरान होकर देखा था मुझे,
जैसे भगवान का तोहफा हूँ सबसे अनमोल मैं।
नींद तो रातों की गवाई थी पापा ने भी,
सुनकर रात को मेरा रोना।
हाथों का झूला दिया था मुझे,
और अपनी गोद का नरम बिछोना।
उंगली पकड़कर चलना सिखाया,
पीठ पर अपनी घोड़े की सवारी कराई,
साइकिल से लेकर गाड़ी तक,
ज़िंदगी की रफ्तार को संभालने की समझ दिलाई।
डाँट में भी छुपा था पापा का प्यार,
उनकी चिंता, उनका ध्यान।
चोट लगने पर मुझे, दर्द हुआ था उन्हे भी,
बस बता ना पाए वो माँ समान।
मेरी जीत पर गर्व है उनको,
मेरी सफलता को बनाना चाहते हैं वो अपनी पहचान,
मेरे नाम से लोग उन्हे पहचानें,
इसी को समझते हैं वे अपनी- आन, बान और शान।
By Nitu Marwah

Comments