Nari
Updated: Sep 16, 2025
By Pramod Kumar Verma
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नारी
नारी की कहानी है बहुत पुरानी,
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सृस्टि आरम्भ से व्याप्त है, नारी ही नारी ।
किस किस से सवाल करू किस किस से जबाब करू निर्णायक तो बताया ही नहीं क्या है, नारी, क्या है, नारी. ऐसी है नारी करे सब संकट भारी ।
मोक्ष की चाहत में, ईश्वर की तलाश करता,
मोहमुग्ध ऋषि दर्शाया यह रुकावट है नारी ।
सबको मनोमुग्ध करता, शायरी सुनाकर, एक शायर बोला, इसका आधार है नारी ॥
समाज के हर पहलू
हर पल खोया,
एक समाज सेवक बोला, समाज का दर्पण है नारी ॥
देश के हर कोने हर क्षण दर्शन करता
एक फिलॉस्पर बोला, सृष्टि निर्माण करने वाली हैं नारी ॥
युद्ध की पहलु से जुड़ा, मौत के द्वार खड़ा, एक यौद्धा बोला, महाभारत कराने वाली है नारी ॥
प्रेमिका की तलाश में, वासना चाहत मे भटकता एक प्रेमी बोला, तृप्ति की चाहत है नारी ॥
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नारी
उमंगों की तरंगो से जुड़ा सारिका की राह मे खड़ा, सफल प्रमोद बोला, क्या है, नारी क्या है, नारी ॥ जीवन की सफ़र में चलना अगर संभल संभल के ।
तो यू पग पग कि जररूत है नारी ॥
कहना बहुत सरल है, बतलाना बहुत कठिन है। इस दुनिया में जितने बड़े, सबके पीछे नारी खड़ी ॥
क्या राज है, इसकी मुख से कहत न पड़े। कहु, पर कैसे, हिंदी कोष मे,
शब्द कोश ना रहे,
कुछ निकलत जीभ से दात में फॅसे,
सब गुण उसमे कुछ अवगुण उसमे । श्रिष्टि आरम्भ से अब तक तो किया उसने,
कालिदास को साहित्याकर करे, तुळशीदास को येह अधिकार भरे सत्यवान का भी प्राण भरे आगरे को येह ताज करे जब जब मौके की तलाश मिले
नारी की कहानी है, बहुत पुरानी । सृस्टि आरम्भ से व्याप्त है, नारी ही नारी ॥
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नारी
ऐसी है नारी करे सब संकट भारी
हर मौके की तलाश करे
चलत जहा भी राह पड़े
रामचंद्र जी को बनवास करे दशरथ का भी प्राण हरे
लंका का सर्वनाश करे
कर्ण से माँ का अधिकार हरे महाभारत का निर्माण करे
जब जब मौके की तलाश मिले
कलयुग में यह अधिकर बढ़ी बिन कपड़े की नारी खड़ी
हर घर ये रिवाज चली मर्द से पहले नारी बढ़ी हर गली पिक्चर हाल बनी जिस गली यह श्रृंगार चली वह महफ़िल भी उदास लगी जिस महफ़िल से नारी चली
- Pramod Verma
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नारी
कलयुग में एक युग बढ़ी कॉलेज मे चश्मा लगा कर चढ़ी
पैर मे सैंडल डाल पड़ी यह अबला सबला से बड़ी हर लड़के से निगाह लगी टीचर से विश्वाश पड़ी
कलयुग रामायण आन पड़ी जब जब मौके की तलाश पड़ी ॥
हर कॉलेज में एक हाल बनी हर नारी की यह लाज बनी
सब इसके बाहर जा पड़ी
अब यह आलीशान खड़ी उस मैदान मे भी बसंत आ पड़ी
जिसमे इनकी चाल बढी कॉलेज मे भी द्वन्द बढी जिसमे जा कर पढ़ी
Pramod Verma
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नारी
जिस कॉलेज मे अकेल पड़ी अपनी चपलता वहा भी जड़ी
उसके पिछे चार खड़े सब उसके हथियार बने
औरो को गड्ढा खोद चली अपने आगे मंजिल को बढ़ी
प्रमोद ने सब इतिहास पढ़ी
पर नारी की चपलता कहत न बनी ॥
By Pramod Kumar Verma

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