Mann
By Sanchita
इस सरस सरल मानस पटल पे,
उथल-पुथल हो तरंग तरल!
उठती-गिरती लहरें, जैसे गहरा समंदर..
कभी गंभीर,
तो कभी हो अधीर,
इस पल यहां, फिर वहां - घड़ी की सुई सा!
दुनियादारी से तर,
तो कभी हल्का, जैसे फाह हो रूई का!
हो स्वछंद, उन्मुक्त बहाव सा,
सच-झूठ में विचरण करता, धूप-छांव सा।
शांत चित्त, फिर मस्ती-मखौल सा,
स्तब्ध! निशब्द- उलझे सवाल सा,
और फिर, खुद ही सुलझे जवाब सा।
रे मन!
क्या कभी किसी की सुनता है तू?
ना किसी के बस में,
खुद की मनमानी करता है तू!
By Sanchita

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