Dhun
By Vivek Upadhyay
ये शब्द एक अनजान धुन पे आधारित हैं । वो धुन जो लेखक को प्रेरणा देती है खो जाने की, आसमानो में उड़ के एक मस्त भरी उड़ान में खुद को ढूंढ लाने की । इस धुन में बेबस बहते हुए भाव कुछ पंक्तियों में प्रस्तुत हैं ।
धुन
तुम्हारी धुन में ना जाने क्या क्या कर जाता हूं मैं ,
जीते जीते तुमपे पल पल मर जाता हूं मैं ,
ना जाने क्या जादू है तुम्हारी प्यारी इन आंखों में,
हर पल तुम्हारी यादों में डूब जाती हूं मैं ।
संजो कर रखती हो दिल के रिश्तों को सीप मे मोतियों की तरह,
सावन की उजली सुबह के नीले आसमान में दिल के सफेद बादल की तरह,
सुनाता हूं तुम को ही फ़साने तुम्हारी ही अदाओं के,
बिन नाम लिए तुम्हारा हर दम तुम्हारे ही गीत गाता हूं,
यूं ही नहीं कोई शिखर छूता हूं पहाड़ों के,
तुम्हे मन में लिए आसमान छू जाता हूं,
आंखें मेरी कहती हैं तुमसे फ़साने मोहब्बत के,
तुमसे दूर कहां अब एक पल भी रह पता हूं ।
By Vivek Upadhyay

Comments