रजा़
By Teri Kalam
‘ प्रभ आरज़ी इस दुनिया में परेशानियां ना पालो,
सुकून-ए-कल्ब़ से मंजूर-ए-खुदा लिख डालो ।’
कांपती थी रूह,
दिखाई देता अंधेरा ।
कांटो का था रास्ता,
रास्ता था वो मेरा ।
थामा न जब किसी ने,
तब तेरी याद थी आई ।
मेरी तड़प की पुकार ने,
मेरी डोर थी तुझे थमाई ।
चलना न आता था मुझे,
डर गिरने से लगता था ।
एक दर पर गिर ही पड़ा मैं,
रोया कुरलाया बड़ा था मैं ।
तेरे प्यार के उस जादू से,
तेरे किये तरस से जान आई ।
तूने ही संभाला था,
तूने ही उठाया था,
रुके को चलना सिखाया था ।
कुछ पाने की न औकात थी मेरी,
न ऐसे हालात थे मेरे ।
निर्गुण था मैं हर तरफ से,
भिखारी बनके आया तेरे दर पे ।
विश्वास से आसरा था पाया,
रज़ा में रहना सिखाया ।
ये तन मन सब कर्ज़दार हुआ,
तेरी रजा़ , तेरी रजा़ से गूंज उठा ।
रजा़ की उस झलक ने रूह को उज्जयारा,
अब कांटो का रास्ता भी लगे जान से प्यारा ।
रजा़ में रहकर जीवन में जान थी आई,
तेरी रजा़ ने थी कलम 'प्रभ' को थमाई ।
क्या कब कैसे होगा,
ये भूल चुके हम साईं ।
बस तेरी रजा़ , तेरी रजा़,
की रट अंदर है लगाई।
By Teri Kalam

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