मैं
By भारती बिंदु
मैं एक बेटी..
किंतु बटी कितने हिस्सों में
घर न रखा
रख दिया पति के साथ
स्वयं दे दिया उनके हाथ
याद की जाने लगी किस्सों में।
जड़ से उखड़
बस गई नए घराने में
हिचकने लगी मैं
अपने ही जन्म घर आने में।
पत्नी बनकर आई
बहू भाभी चाची
मामी भी बनाई
कट कट खट खट
लगा बीतने वक्त
मम्मी बनते ही
पुकारने लगा रक्त!
कर्तव्य प्रथम अपनाया
स्व इच्छा स्व दफनाया
खुश थी मैं खुश वो हैं
इतना ही जानकर
हर पल हर पग
लगी बढ़ाने ध्यान कर
हर छोटे पहुंचे
सर्वोच्च स्थान पर
बटी और डटी रही
मैं अपनें ही ठिकान पर!
वक्त का पहिया
घूमते घूमा घरवार मे
बटते बटते बट गई
अपने ही परिवार में
जिसको जितनी
जैसी जरूरत
रही खड़ी हरबार मैं!!
By भारती बिंदु

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