मां
By Pallavi Jawalkar
देख लेना अपनी उस मां को, जो बिना किसी आशा के लगी रहती है
अपने परिवार को खुश करने में जो बिना किसी चाहत के लगी रहती है
"जब भी गर्त में जा रहे हो निराशा के", बस एक बार,
देख लेना अपनी उस मां को, जो बिना किसी आशा के लगी रहती है
वह जो करती है, उसके लिए उसे कुछ नहीं मिलता
सिर्फ तारीफ़ के दो बोल ही तो हैं, पर उसके लिए भी हमें समय ही नहीं मिलता
"बचपन में तो उसने हमें कभी कुछ कहा नहीं करने के लिए
पर बड़े होने पर भी हमने कहां जरुरत समझी, समझने के लिए।"
" वह सिर्फ हमारा समय ही तो चाहती है
तारीफ़ के दो बोल ही तो चाहती है"
मदद ना भी कर पाओ उसकी ग़र, कोशिश तो करो
एक बार उसे समझने की तुम, ज़हमत तो करो
वह चिल्लाती तभी है, जब परेशान हो जाती है
बिना किसी कारण के डांटती तभी है, जब थक कर चूर हो जाती है
रोज़- रोज़ एक ही काम करके तो हम भी ऊब जाते हैं
तो वह कोई तो नहीं, जो बिना किसी झिक- झिक के हमेशा काम करती रहे
फिर भी दिन भर लगी रहती है, बिना किसी उम्मीद के
सिर्फ हमारे लिए
" जब कभी भी सारे रास्ते बंद हो जाए,
उदासी के बादल छा जाए", बस एक बार
देख लेना अपनी मां को, जो बिना किसी आशा के
एक प्यारी सी मुस्कराहट लिए, दिन भर लगी रहती है
सिर्फ हमारे लिए
By Pallavi Jawalkar

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